वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Monday, May 23, 2005

छतरी

मैं छतरी ले कर निकला था पर शहर के पास पहुँच कर उसे कार में ही छोड़ दिया, यह सोच कर कि धूप है और बादल अभी दूर ही हैं.. पर यह भी बात मन में आई कि छतरी यहाँ तक साथ ले आया तो बारिश अब होगी ही. पर एक आवाज बोल पड़ी कोई बात नहीं रहने हो उसे.
काश छतरी साथ ले आता मैंने सुपरमार्केट से निकलते हुए सोचा, झड़ी लगी हुई थी, पर मैं रुका नहीं भीगते हुए चल पड़ा कुछ आगे जाकर एक दुकान की चौखट पर रुक गया, बस थोड़ी के लिए यह रुक जाय कार तक पहुँचने भर के लिए.. और जैसे उसने मेरी बात सुन ली वह कुछ रुक गई और मैं कुछ ही देर में कार तक पहुँच गया.
फिर वह चालू हो गई तेज हो गई, बौछारों में ओला वृष्टि भी आरंभ हो गई घर के सामने पहुँचते पहुँचते.
एक बार फिर छतरी हाथ में इस बार ओलों की बौछार को संभालती, बस पाँच कदम दरवाजे तक.

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