वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Sunday, July 17, 2005

लकीर


मैंने तो कभी नहीं कहा मैं खींच रहा हूँ आकाश पर लकीर, मैंने बस बोलते हुए सोचा
आकाश पर लकीर खींच रहा हूँ ,
कि
नींद खुल गई यह देखकर


17.7.05 © मोहन राणा