वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Saturday, November 26, 2005

अपवाद

तुम अपवाद हो इसलिए
अपने आपसे करता मेरा विवाद हो,
सोचता मैं कोई शब्द जो फुसाले दे
मेरे साथ चलती छाया को कुछ देर कि मैं छिप जाउँ किसी मोड़ पे,
देखूँ होकर अदृश्य अपने ही जीवन के विवाद को
रिक्त स्थानों के संवाद में.


26.11.05 © मोहन राणा