वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Sunday, November 19, 2006

मध्यावकाश



एकाएक शरद का रूप
प्रकट होता
सुर्ख पीला और गीला
गिरे गलते पतझर पर संभल कर पैर रखता
उतरता ढलान पर
बढ़ता शहर को
पास आता कोलाहल खो कर अपना मंतव्य
केवल शोर.. हर भाषा में शोर
सुनते थोड़ा ध्यान से एक एक कदम

मैं गिर कर नहीं देखना चाहता आकाश को,
बस मन है अभी धरती पर चलने का
बिना भय के
बिना किसी आशंका के
बिना अनजाने आंतक को छुए,
बस देखना मोहक शरद को
समेटते वसंत की स्मृति को धौंकते रंगों के साथ,
लेते एक लंबी सांस.

कि तभी मोबाइल बजने लगा

कहाँ हैं ? कोई प्रश्न

जी सड़क पर हूँ! एक जवाब

हँसता फिर एक और सवाल
क्या घर से बाहर कर दिया?

नहीं घर से तो बाहर हूँ
पहले ही !
फिर वही हँसी पर कोई और प्रश्न नहीं विदेश में!
बस एक बात
क्या कुछ छूट तो नहीं गया इस मध्यावकाश में
- पत्तों की खड़खड़ाहट अकेली
कोई पहचान पुरानी



17.11.06 © मोहन राणा

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