वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Monday, February 01, 2010

चाँदनी रात में खामोशी

मैं सहमत हूँ
चाँदनी रात में खामोशी से
मन में सीत्कारती चिंताओँ से
दिल में कुछ ढोती बेचैनी से
कमर में किसी बोझ की अनुभूति से
मुझ से थक चुकी नींद से
मैं सहमत हूँ
तुम्हारे भय से
दिन के अँधेरे में चलते आर्तनाद से,
असहमतियों के साथ बैठे
इस स्थिति से सहमत हूँ
थक चुका हूँ कतारें बदलते बदलते

निश्चित नहीं है जीवन में आश्चर्य हमेशा
अगर किसी को मालूम हो घड़ी में निरंकुश समय बदलना
हो चुका है अतीत जो अब याद नहीं है भविष्य की तरह,
कितनी बार बदली सूईयाँ मैंने इसकी
हर बार मैँ ही गिरता
मैं ही चूकता
मैं ही भूलता
साबुन के बुलबुले उड़ाते

© मोहन राणा
31.1.10