वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Saturday, February 20, 2010

शोक सभा में

बुदबुदाते शब्द झर कर गिर जाते अदृश्य धूल के कणों की तरह
चर्च के ठंडे फर्श पर
प्रार्थना के शब्द
शोक के शब्द
स्मृति के शब्द
अनुपस्थिति को उकेरते शब्द
विस्मृति की स्याही में
एकांत के शब्द


इस बार बसंत भी भूल गया जल्दी आना.
क्या मैं फुसफुसा दूँ कुछ तुम्हारे कानों में
(इस मृत्युलोक में जीवित देह)
इससे पहले कि तुम भूल जाओ इस जनम को
केवल हमारे लिए बुदबुदाते स्वरों के बीच


20.2.10 कविता - फोटो © मोहन राणा

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