वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Thursday, March 25, 2010

पानी का चेहरा


चिमनी में करती रही बातें
हवा कल सारी रात
जंगलों की कहानियाँ
पहाड़ों की यातना
समुंदरों का सीत्कार
सो रही और कहीं जागती दुनिया के दुस्वप्न
उसके अल्पविरामों के बीच
झरती बरसों पहले बुझ चुके अंगारों की राख,
चुपचाप
नींद में भी
सुनता रहा अपने आप को समेटता
जूझता रहा उसकी उमंग से,

मैं अँधेरे में पानी का चेहरा था
पेड़ों और दीवारों पर बहता


© मोहन राणा

"धूप के अँधेरे में" (2008) से