वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Friday, August 27, 2010

पुराने दिल्ली के स्टेशन बाहर



{The Taoist sage has no ambitions, therefore he can never fail. He who never fails always succeeds. And he who always succeeds is all- powerful}
चंपारण से कई घंटो की सत्याग्रह एक्सप्रेस यात्रा के बाद
जनसेवक जी बड़ी मुश्किल से कमर सीधी कर प्लेटफार्म पार कर सके
बाहर बाबा लाउत्से अपने तोते के साथ बैठे थे
टैस़ला से जानें अपना भविष्य, मुड़े हुए गत्ते पर बाकी मिट गया था,
प्यार से पुचकारते टैस़ला को दाना चुगाते
एक दाना वे खुद भी चबा लेते,
जनसेवक जी अपना झोला झाबा संभालने वहाँ रुके
कि लाउत्से ने आवाज दी
अरे ओ जनसेवक कहाँ जाता है बच्चा
ले जाने ले अपना भविष्य टैस़ला से
काली के युग में हाहाकार
बतायेगा तुम्हारी महादशा
जान ले इससे पहले हो जाए तुम्हारी लालबत्ती,
जनसेवक जी पान की पीकों से रंगीन पौधे के गमले की ओर छड़ी उठा के बोले
नहीं भय्या जल्दी ही
अपनी तो बत्ती जाने कब से फ्यूज़् ही है

©27/8/10

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