वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Tuesday, August 31, 2010

देखना जो दिखता नहीं


देखना जो दिखता नहीं
अपने नाप का चश्मा लगाके भी,
मन की आँखों का मिलता नहीं
बिना खुले दिखता नहीं अगोचर
परिचित लौकिकता में,
तैयार हूँ आखें बंद किये
आश्र्चर्य देखने को