वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Monday, October 10, 2011

इसमें झिझक कैसी

वक्त ही ऐसा कि हवा भटकती है
सांय सांय सिर फोड़ती खिड़की दरवाजों पर,
इस कोलहाल के वीराने मुझे अपनी सांस से भी लगता है डर
मैं उसे आशा की तरह साधे रहता हूँ अपनी मुस्कान में.

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