वह रुका पल कोई घर है कहीं

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Wednesday, June 15, 2016

शेष अनेक – मोहन राणा



शेष अनेक  – मोहन राणा 

- गोबिन्द प्रसाद





मोहन राणा अपनी पीढ़ी के उन थोड़े से कवियों में हैं जिन्होंने आठवें दशक के बाद की कविता के परिदृश्य को अपनी काव्यात्मक उपस्थिति से बहुत कुछ बदल दिया है। यूँ तो काव्य विषय अपनी मूल प्रकृति में वही रहते हैं। फिर भी, काव्य-विषय बहुत कुछ वही होने पर भी कवि अपनी दृष्टि का नया आसव भरकर इनमें एक नई दीप्ति, एक नया आस्वाद भर देता है। हर समर्थ कवि जैसे ही किसी चीज़, वस्तु, दृश्य, मनुष्य, प्रकृति अर्थात गोचर-अगोचर संसार को देखता है तो वह प्रायः बदल जाती है। कहने का अभिप्राय यह कि वह ;  वह नहीं रह जाती कवि के देखने से पूर्व जो वह थी। यही वह काव्य दृष्टि है - इसी को काव्य बोध या काव्य अनुभूति का विधान भी कह सकते हैं। मोहन राणा भी उन कवियों में से हैं जो जिस  चीज़ को अपनी दृष्टि की परिधि में लाते हैं उसे अपने देखने भर से ही वे उन चीज़ों के रंग, रूप, रुख़ और उनका किरदार बदल देते हैं।

चीज़ों का यह चरित्र बदल देना आसान काम नहीं. लेकिन मोहन राणा अपनी कविताओँ में यह काम बहुत सहज  करते दिखाई देते पड़ते हैं।  हालाँकि एक कवि होने के नाते मैं अपने अनुभव से जानता हूँ कि यह काम उतना आसान नहीं है जितना प्रतीत होता है इसके पीछे एक ख़ासे लंबे तज्रबे और मश्क की जद्दो-जेहद छिपी रहती है। इस सहजता  को साधने में उनकी भाषा बहुत साथ देती है , उनकी काव्य संवेदना का।  उन्होंने जो भाषा अपने लिए बनाई है या चुनी है उसकी अपनी एक भूमिका है संवेदन का जगाने की दिशा में। बिम्ब –प्रतीक अथवा मिथक आदि से कविता बनाने के प्रचलित साँचेबद्ध फ़ार्मूले में अपने को बिना बाँधे और बिना  रिड्यूस किए ही वे अपनी संवेदना को मूर्त करते चलते हैं। यह उनकी अनुभूति के नए विधान और तदनुकूल उसे संप्रेषित करने वाले भाषिक-विन्यास और कौशल का ही कमाल है।

मोहन राणा की कविताओं मे सामाजिक सरोकार और जीवन का यथार्थ यांत्रिक रूप से बहुत ठोस नहीं दिखाई पड़ता।  कारण यह कि वे यथार्थ को बहुत सतही और  स्थूल धरातल पर पकड़ने के बजाय उसे उसके भीतरी रूप में पकड़ने का प्रयास करते हैं।  उनकी कविताओं में बयान का तौर-तरीक़ा कुछ ऐसा है कि लगता है यथार्थ की ठोस मोटी चादर के बजाय उनकी काव्य संवेदना सपनीले जल से जैसे झाँकती है। गोचर-अगोचर संसार के स्पंदित रूप, अभाव –आकांक्षाओं से भरी स्मृति-विस्मृतियाँ और मानवीय सह सम्बंधों के तमाम चेहरे वे अपनी इसी अर्जित शैली में आँकते चलते हैं।

शेष अनेक  (कविता संग्रह)
मोहन राणा
© 2016
कॉपर कॉईन पब्लिशिंग 
ISBN 978-93-84109-05-9
 
शेष अनेक ( Shesh Anek)
Poetry collection by Mohan Rana
Publisher
Copper Coin Publishing
© 2016 मोहन राणा
ISBN 978-93-84109-05-9

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