मैं लिखने बैठा गश्ती चिठ्ठियाँ
पेड़ के नीचे अनवरत मर्मर में,
पतझर में वे गिरती रहीं
तुम्हें देख मैं ठहर गया
(2024)
घर धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात धन्य वे बीज ज...