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Wednesday, 8 November 2023

एकांत में रोशनदान : मोहन राणा Ekaant men Roshandaan : Mohan Rana

 कविता संग्रह / Poetry Collection

                                           एकांत में रोशनदान (2023)

 


                          नयन पब्लिकेशन  -- https://amzn.eu/d/9ddsXkJ

  • प्रकाशक ‏ : ‎ Nayan Publication (7 सितंबर 2023)
  • भाषा ‏ : ‎ हिंदी
  • पेपरबैक ‏ : ‎ 130 पेज
  • ISBN-10 ‏ : ‎ 8195429920
  • ISBN-13 ‏ : ‎ 978-8195429929

 

"मोहन राणा अनूठे कवि हैं। उनका रहस्य को शब्दों की टपरी के नीचे अर्थ की छाँव में क्षण भर के लिए आमंत्रित कर लेने का हुनर लाजवाब है। उनके अपने शब्दों में ‘कवि जब लिखता ही नहीं बल्कि कविता में जीता है तो रचना कालातीत हो जाती है।’ वे कविता को जीते हुए उसके कालातीत होने की घटना के साक्षी बनते हैं। उनकी कविता साधु की तरह रमण करती है, यायावर कि तरह विचरण करती है, परिदों की तरह उड़ान भरती है और अनचीन्हे, अनुबूझे गन्तव्यों से गुज़रकर सूक्ष्म रहस्य की छाँव में एक परिपूर्ण पथिक की भाँति विश्राम करती है। मोहन राणा की कविताएँ कुलाँचे भरती हैं- शब्द के पार अर्थ की ओर, अर्थ के पार भाव की ओर, भाव के पार बोध की ओर, बोध के पार निविड़ मौन की ओर ; और मौन के पार शून्य की ओर। "
- चैतन्य प्रकाश योगी


समीक्षा / Review
https://www.raagdelhi.com/mohan-rana-ekant-me-roshandaan-review-by-naresh-shandilya/

Thursday, 12 August 2021

दो कविताएँ / Two Poems

रागदिल्ली के जुलाई अंक में  दो कविताएँ

 

खड़ीक* का पेड़

 

मैं किसी को नहीं जानता था

मैं सबको भूल जाऊँगा  

पर

मैं पत्थर था बहते पानी में

आकाश को निहारता

मैं स्मृति था भविष्य की

मैं जीव नहीं अजीव नहीं

कोई नाम जो अब नहीं बंधा

किसी जीवन की पहचान से

पर

पास उतना ही दूर है अभी से

जलते जंगलों में उस पार

अभी कभी नहीं मिलता

कल आज कल ही मिलते

नये रूपों में आसक्त ग्रीष्म की इकहरी छाया में

उनकी मर्मर निकटता को संभालता,

मैं जड़गत एकांत में!

[*खड़ीक का पेड़ उत्तराखंड में पाया जाता है और पशु चारे के लिए उपयोग में आता है।] 

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 पहचान जाने उस अपने से

 

खुली आँखों को बंद किये बंद कानों को खोले आत्मा की खोल में

चलता मैं बूझता वह पहला शब्द तुम्हारे लिए

कि तुम सच हो जाओ हमेशा के लिए

एक अनायास झोंके में लड़खड़ाई अस्तगामी दोपहर

कि हिले नहर पर झुके इकहरे प्रतिबिम्ब हल्के से

छुपी चमक कौंधी हरी सतह पर,

मेरे कानों ने पढ़ा हवा की उस लहर को

लिखा उसमें जैसे तुमने फुसफुसाकर कि

पूरा हुआ एक जीवन कहीं चिर मौन में

कि आरंभ हुआ गोचर पहली सांस के सीत्कार में!

अपने अर्धविरामों से बाहर झाँक

पहचाना हमने अपरिचितों में

अपने लायक भूख और प्यास

कोई मैं और तुम उनमें

जो कुछ मेरा कुछ तुम्हारा,

रोपते जीवन के रिक्त स्थानों में जंगल जहाँ हवाएँ साँस ले पायें

अपनी छायाओं का बोझ उतार ले पाए दोपहर दिवास्वप्न

और कुछ देर बस यूँ ठहर जाय

फिर अदल बदल सौंपकर बढ़ लें अपने अकेलेपन को  

सुना कर खोई हुई स्मृतियों में एक दूसरे को

दूर की अनुगूँजों में आवाज़ें लंबा साथ पैदल समझ  कर

छोड़ गया एक बादल अपने हिस्से का आकाश

सजल हो गई आँखें नीलिमा पर अपलक

पानी का एक घूँट बहा गया कुछ अटका

बहुत दिन हुए, बहुत दिन हो जाएँगे, फिर फिर

समय सिक्त स्मृति शेष कोई बूँद गिरेगी

सूखी बावड़ी के  बीते सोपानों पर

मैं एक बार फिर लिखूँगा मिट्टी से

मिट्टी का पुतला

जो कुछ यहाँ वो

मैं हूँ जो देह नहीं

तुम्हें याद करता, तुम जो देह नहीं।

 

 

 

 

रागदिल्ली के जुलाई अंक में  दो कविताएँ

https://www.raagdelhi.com/poetry-by-mohan-rana/

Wednesday, 30 September 2020

स्लोवेनिया में कविता पाठ - Poetry reading in Slovenia

 


 कविता और  वाइन के  उत्सव (24 वें) [26.—29. 8. 2020]   के  दौरान  अंतिम दिन 

सार्वजनिक कविता पाठ।

- मोहन राणा


Poetry reading on the closing day of the 24th festival "Days Of Poetry And Wine 2020" at Ptuj.
[26.—29. 8. 2020]
 
-Mohan Rana 
 
 
 
(Photo : Matej Pušnik)

 

Language of poetry : Mohan Rana, pjesnik na Svački

  Rather than mapping human-made political borders or country lines, Rana acts as a cartographer of "nameless, invisible boundaries...