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Saturday, 1 August 2026

Poetry podcast of poem Ghar (घर ) on youtube

  

 


 घर


धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत
धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता
धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात
धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते
धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख
उसकी स्मृति को
धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ
जो बन जाती टॉकीज़,
आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में
धन्य यह साँस,
मैं कैसे भूल सकता हूँ घर
और कोने पर धारे* का पानी

 

 

*उत्तराखंड में पहाडों में किसी-किसी स्थान पर पानी के स्रोत फूट जाते हैं। इन्हें स्थानीय
भाषा में धारे कहा जाता है। 

 

-मोहन राणा 

 कविता संग्रह " शेष अनेक"  (2016)





One of my poem. I found this audio podcast on youtube yesterday, I noticed it is  4 month old.  The poem is
  " घर/Home''  , Published in my 8th collection " शेष अनेक/ Much remains"  (2016)
 
 
 
 
31/7/2026 

 

Poetry podcast of poem Ghar (घर ) on youtube

        घर धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात धन्य वे बीज ज...