घर
धन्य धरती है जिसकी करुणा अक्षत
धन्य समुंदर जिसका नमक फीका नहीं होता
धन्य आकाश जो रहता हमेशा मेरे साथ हर जगह दिन रात
धन्य वे बीज जो पतझर को नहीं भूलते
धन्य वे शब्द भूलते नहीं जो चौखट पर कभी बाट लगाते दुख
उसकी स्मृति को
धन्य उस विचार पहिए पर टँकी छवियाँ
जो बन जाती टॉकीज़,
आकाशगंगा के छोर चुपचाप परिक्रमा में
धन्य यह साँस,
मैं कैसे भूल सकता हूँ घर
और कोने पर धारे* का पानी
*उत्तराखंड में पहाडों में किसी-किसी स्थान पर पानी के स्रोत फूट जाते हैं। इन्हें स्थानीय
भाषा में धारे कहा जाता है।
-मोहन राणा
कविता संग्रह " शेष अनेक" (2016)
One of my poem. I found this audio podcast on youtube yesterday, I noticed it is 4 month old. The poem is
" घर/Home'' , Published in my 8th collection " शेष अनेक/ Much remains" (2016)
31/7/2026
