वह रुका पल कोई घर है कहीं

वह रुका पल कोई घर है कहीं

Thursday, November 16, 2017

बावली धुन

रात थी सुबह हो गई
करवटों में भी नहीं मिली कोई जगह
यह ग़लत पतों की यात्रा है मेरे दोस्त
रास्ता भूलना है तो साथ हो लो,
शर्त यही कि भूलना होगा अपना नाम पहले,
वैसे डर किसे नहीं लगता लोगों के भूल जाने का
याद दिलाते रहें जनम जनमों तक
उन्हें अपनी अनुपस्थिति की।
कब होगी पहचान सपने और सच्चाई की
जागकर भी कैसे पता चले जवाब
जब सोया हो हर कोई आसपास
स्मृति की नींद में,
एक बावली धुन साथ है जो उतरती नहीं मन से।


(रेत का पुल, 2012)


An Obsessive Tune

Night passed and the morning came,
though, tossing and turning, I got nowhere.
A journey, dear friend, to wrong places.
If you want to lose the way, we
will go together, on condition
that first you forget your name.
No one wants to be forgotten, it is true,
but may they, life after life,
be reminded of their absence.
When will dreams be recognized, and truth?
Even after waking, how can we know the truth
when everyone around is sleeping
the sleep of memory;
An obsessive tune fills my mind.


Translation from Hindi :
Lucy Rosenstein
Bernard O’Donoghue
From Ret ka Pul (Bridge of Sand, 2012

Tuesday, October 24, 2017

This Place is Enough






This Place is Enough

Between two addresses, an undiscovered geography—
I wrote it, kept it aside, and bothering not to read
A face at first, then a second, and a third…
A story that was yours and mine remained an unfinished business
Like a corpus of drying clothes tossing in the wind
Like always, ripe with a miscellany of the unconsummated—
In those pages, I tuck another day,
Turning them and then I walk away

Winter! A muffler around my neck
I turn back to inspect something, groping for my pocket
Feeling like a stranger to myself,
I disappear from the street into an alley
From the visible self, past the threshold of the door
Household, to courtyard, to solitude

In the guise of hope fear follows at each step
My shadow, like a receipt for arrivals and departures
So I have stopped
Here and there, between shadows, measuring my height
And then running with shackled feet, until
This place that is enough to stand, hide
And lie in silence
Or turn into the green doob grass.

Translation from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay.






यह जगह काफ़ी है

दो पतों के बीच लापता भूगोल में
लिख बंद कर दिया पढ़ना मैंने चेहरा एक नाम दूसरा फिर तीसरा,
मेरी तुम्हारी कहानी रह गई किसी बात पर
सूखते कपड़ों सी उलट अपनी देह को टटोलती हवा में
हमेशा की तरह इस बार भी शेष अनेक
उन पन्नों में एक आज फिर
उलटता रखता
उठ कर चल देता

सर्द मौसम मफ़लर गले में झूलता
मुड़ के कुछ देखते जेब टटोलते
कि पहचाना नहीं जाता हूँ ख़ुद ही
सड़क से एक गली में हवा होते
सरे आम से दरवाज़े पार कहीं,
घर बार, आंगन एकांत में

उम्मीद की शक्ल में डर हर क़दम निहित
मेरे साथ है किसी पर्ची पर लिखे आगमन और प्रस्थान की तरह,
तो अब बंद कर दिया      
यहाँ वहाँ छायाओं में कद नाप अपने पाँवों को बाँध कर भागना,
यह जगह काफ़ी है खड़े होने छुपने
और लेट कर चुपचाप
हरी दूब हो जाने के लिए


2010 

[शेष अनेक {2016} ]
प्रकाशक - कॉपर कॉयन

Sunday, October 22, 2017

मिट्टी का पुतला

मेरे पीछे लगा समय
दिखता दूर कि लगता धीमा पड़ रहा है
पर नज़दीक भाग रहा है  घड़ी के डायल में
और मेरे दिन की छायाएँ छुप रही हैं
जिनमें  मैं फिसलता अपनी
इच्छाओं से बोझिल
मैं लिखता अपनी
सुनता अपनी 
जहाँ औरों के आकाश हैं और पराये स्वदेश
ख़ुद ही बिसरी स्मृतियों के  इन सीमान्तों पर
इतना उजला है आईना यहाँ
कि चटख दोपहर अदृश्य है
नहीं पहचान पाता मैं प्रतिबिम्ब अपने हाथों में
दम साधे एक अँधेरे को खुली आँखों में  छुपाये
- मोहन राणा
© 2017

Friday, August 11, 2017

ब्रांड


दलजीत नागरा की एक किताब का नाम है, ब्रिटिश म्यूज़ियम
फेबर महान कंपनी है । किताबों के बाज़ार में बड़ा नाम
जैसे रेडियो में फिलिप्स जूतों में बाटा
हाथी ब्रांड का आटा
और टाटा के ट्रक चाय और नमक

सड़कों पर नींद भी शायद
निर्जनों में बेहाल एकांत भी किसी का ब्रांड
किसी कवि का लिखा विज्ञापन
शाम की ख़बर की बाइट हो

पर पकौड़े खाने का मन था
नामों के पूरक नाम पर टूट पड़े एक किराने के दुकानदार पर
विकल्प जी अविकल रात दस बजे
उन्हें चाहिये था बेसन पर वहाँ ग्राम फ्लावर बिक रहा था
दुकान शर्मा जी की थी ब्रसेल्स में 
होशियारपुर में उनकी कभी राशन की दुकान भी होती थी
जिसका खाता वे साथ ले आए थे यादाश्त के लिए

हाँ तो कल कि मैट्रौ स्टेशन पर बात रुक गई थी
बड़े दिनों बाद मिले उसने जब कहा था!





- मोहन राणा

© 11 अगस्त 2017

Wednesday, August 09, 2017

सात बज़े का अलार्म

पुरस्कार बँट चुका
बाहर लोग समोसों और चाय पर झोल रहे हैं
पर मैं हॉल में अभी भी बैठा हूँ एक सिकुड़ती मुस्कराहट को चेहरे पर रोक
बिना नब्ज़ पकड़े अपनी धड़कन सुन सकता हूँ यहाँ,
इस आशा में ताकता
खाली मंच  को
वह आए
और इस बार सही सूची पढ़ कर सुनाए
कि रेडियो की आवाज़ ठीक सात बज़े का अलार्म।
ऐसी ही कोई चीज़ मुझे चाहिए
जो बिना चाहे भी उपस्थित हो हमेशा
ना रहे  संताप उस वांछित  के ना होने का

9.8.17
© मोहन राणा

कविता का पाठ । Poetry reading


पिछले महीने इयान वुलफर्ड बाथ एक दोपहर पहुँचे। उस मुलाकात के दौरान उन्होंने
मेरी एक कविता पढ़ी।

During a visit to Bath Ian Woolford reads a poem by Mohan Rana in Hindi.


Sunday, July 16, 2017

This Place is Enough

 Poem - MohanRana

 

This Place is Enough

Between two addresses, an undiscovered geography—
I wrote it, kept it aside, and bothering not to read
A face at first, then a second, and a third…
A story that was yours and mine remained an unfinished business
Like a corpus of drying clothes tossing in the wind
Like always, ripe with a miscellany of the unconsummated
In those pages, I tuck another day,
Turning them and then I walk away
Winter! A muffler around my neck
I turn back to inspect something, groping for my pocket
Feeling like a stranger to myself,
I disappear from the street into an alley
From the visible self, past the threshold of the door
Household, to courtyard, to solitude
In the guise of hope fear follows at each step
My shadow, like a receipt for arrivals and departures
So I have stopped
Here and there, between shadows, measuring my height
And then running with shackled feet, until
This place that is enough to stand, hide
And lie in silence
Or turn into the green doob grass.



Translation from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay.

Tuesday, July 11, 2017

कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद । Poems in English translations.

कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कुछ कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद । Poems in english translations from the poetry collection 'Shesh Anek'.

अरुप के. चटर्जी और अमृता अजय ने कविता संग्रह 'शेष अनेक' की कुछ कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद

A Miscellany of the Unconsummated

कुछ दिनों पहले किये थे वे इस महीने   कोल्डनून पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं।


Few poems are published in English translations  from Hindi by Arup K Chatterjee and Amrita Ajay in Coldnoon magazine this month.