Wednesday, 1 January 2020

The Cartographer

The Cartographer

Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.
There you are, absent, in every empty space
of life. In every gap of time
on these panic-stricken roads.
I don’t look out any window,
I don’t stop at any door
I don’t watch the clock
I hear no one’s call.
As geography changes its borders,
fear is my sole companion.


From Ret ka Pul (Bridge of Sand, 2012)

Translation from Hindi
Lucy Rosenstein, Bernard O’Donoghue


नक़्शानवीस


पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में
समय के अंतराल में
इन आतंकित गलियों में ।
मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर
रुकता नहीं किसी दरवाज़े के सामने
देखता नहीं घड़ी को
सुनता नहीं किसी पुकार को,
बदलती हुई सीमाओं के भूगोल में
मेरा भय ही मेरे साथ है ।


(रेत का पुल, 2012)

©  मोहन राणा

Tuesday, 6 August 2019

रेत का पुल / RET KA PUL



Mohan Rana's poetry is always tuned to sounds from near and afar. At the same time it captures in its images the essence of close and distant sights. In his poetry memories too play an important role. Weaving together all of these, it connects us with experiences which are very rare. They expand our vision and their subtle connections hand us some invisible strings of perception. Passing through these experiences is pleasant, yet often the questions and the sting of pain present in them provoke us to appraise reality anew. Reading his poetry acquaints us with the intimate side of daily life in a new way. At the same time, it takes us along at the speed of lightning and makes us travel through new dimensions of everyday social and family life. Written in accomplished language, his poetry attracts us also with its natural charm.
These qualities are abundantly present in Mohan Rana’s new collection. Moreover, it is notable that in it he has also invented a new poetic language for himself. These poems have a new cadence. Urdu poetic forms have been included and this naturally reminds us of the poetic range of a lyricist like Shamsher.
These poems have wide concerns. They are not only restless in their search for life-values in a changed global world; there is also a dreaminess about them. They enter the deepest folds of the psyche in a new manner, and at the same time look at the happenings in the outside world with a piercing gaze; world which is flooded with scraps of language yet language itself has to overcome this deluge to regain its pure form. This collection has made the terrain of Mohan Rana's poetry more fertile and given Hindi poetry itself a personal expression which will attract the attention of many.

Prayag Shukla 18/7/12

Friday, 2 August 2019

नक़्शानवीस / The Cartographer

Poem >>Mohan Rana

The Cartographer

Between the lines it’s you,
absent, but a silent presence
just as the rain is absent in the passing clouds.
There you are, absent, in every empty space
of life. In every gap of time
on these panic-stricken roads.
I don’t look out any window,
I don’t stop at any door
I don’t watch the clock
I hear no one’s call.
As geography changes its borders,
fear is my sole companion.


From Ret ka Pul (Bridge of Sand, 2012)

नक़्शानवीस

पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो
तुम एक ख़ामोश पहचान
जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश,
तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में
समय के अंतराल में
इन आतंकित गलियों में ।
मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर
रुकता नहीं किसी दरवाज़े के सामने
देखता नहीं घड़ी को
सुनता नहीं किसी पुकार को,
बदलती हुई सीमाओं के भूगोल में
मेरा भय ही मेरे साथ है ।


(रेत का पुल, 2012)



Bridge translators

Lucy Rosenstein

Final translator

Bernard O’Donoghue



Monday, 24 June 2019

The Evening News and the Roof of the World : Mohan Rana


    सपने में मैंने देखा हम दुनिया की सबसे ऊँची छत पर थे
    फिर भी तारे बहुत दूर थे
   और अंतहीन था अँधेरा

    Then in a dream I saw that, though we were
on the highest roof in the world,
the stars were still far away
and the darkness had no end.
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DUAL POETRY PODCAST

The Evening News and the Roof of the World by Mohan Rana

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 LISTEN NOW:
 
 

Tuesday, 11 June 2019

Poetry reading : Mohan Rana


After the poetry reading in London. The Far-Flung Shuffle!
At poetry cafe 25/5/19
https://poetrysociety.org.uk/event/the-shuffle-15-2019-05-25/

Gale Burns and Selina Rodrigues present a reading from far and wide:
Usha Akella, (Texas, USA), Paddy Bush (Ireland), Mohan Rana (Bath, UK), Theo Dorgan (Ireland), Adam Crittenden (USA), Ella Frears (London, UK)

 Paddy Bush, Adam Crittenden, Ella Frears, Mohan Rana























Monday, 3 June 2019

नुक़्ते में नुक़्ते में जुड़ते अक्षर


"घर बैठे छापें दुनिया में बेचें"

रेट लेंगे उतना ही पर तृप्ति किसे
और और कहते कहते फिर भी

शरमा जाते हैं अगर जी परन्तु
लक्ष्मी चाहे जिस झंडे की हो ;
वाम हो बजरंग हो रंग तो एक ही लाल
काँटा तो घरम काँटा  तोल कर 
पर हो बट्टा सौदे में,
रद्दी से ही बीन कभी कविता भी पाई जाती है
विरले पल साँप सीढ़ी के खेल में किस्मत की जे बात,
बाज़ार भाव में कारीगर की कीमत
तो फिर भी सेट है मोक्षपथ में दो कौड़ी
 
© 2019

Tuesday, 28 May 2019

Poetry reading in May

The Far-Flung Shuffle
 
Gale Burns and Selina Rodrigues present a reading from far and wide:

Usha Akella, (Texas, USA), Paddy Bush (Ireland), Mohan Rana (Bath, UK), Theo Dorgan (Ireland), Adam Crittenden (USA), Ella Frears (London, UK)


Friday, 24 May 2019

जो पास सामने



कविता poem_mohan rana
















अपना एक देस

लोगों ने वहाँ बस याद किया भूलना ही
था ना अपना एक देस बुलाया नहीं फिर,
कोई ऐसा वादा भी नहीं कि इंतज़ार हो,
पहर ऐसा हवा भटकती
सांय सांय सिर फोड़ती खिड़की दरवाज़ों पर,
दराज़ों को खंगालता हूँ सबकुछ उनमें पर कुछ भी नहीं जैसे
चीज़ें इस कमरे में चीज़ें मैं भी एक चीज़ जैसे
मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम मेरी उम्मीद क्या निरंतर खोज के सिवा,
अपनी नब्ज़ पकड़े मैं देस खोजता हूँ नक़्शों में
धूप की छाया से दिशा पता करते
पर मिलीं मुझे शंकाएँ हीं अब तक

मोहन राणा © 2019 

(स्रोत कविता संग्रह  /  रेत का पुल,2012)

Wednesday, 15 May 2019

कविता


पुरानी खिड़की


दूरबीन में नज़रबंद हैं दूरियाँ
वो जो अटारी में कहीं  रखी है

पुरानी खिड़की पर ज़रा भी कहीं निशान नहीं
हवा धूप और बारिश का
समय पर किया रंग चमकता है,
फिर भी उसे पुराना कहा जाता है पुरानी खिड़की
किताबों में बंद पड़े हैं शब्द अनगिनत
गत्ते के डिब्बों में  बंद पड़ी हैं किताबें,
पुरानी खिड़की  के सिर्फ़ शीशे हुए हैं पुराने
जैसे पुराना ज़माना
पुरानी कमीज़
पुरानी कविता
पुरानी कोई बात,
उसके जीवन  के अस्सी साल दो पन्नों में सिमटे हैं
दो पन्ने कंप्यूटर की स्मृति में जमा हैं

पुरानी खिड़की से स्थिर नहीं दिखती दुनिया
डगमगाती दुनिया  में धीरे से हिलती हैं नाशपाती के पेड़ की टहनियाँ,
उतरते हैं बादल भरती है उड़ान चिड़िया
ढलानों  पर उतरती  हैं भेड़ें दोपहर की तरह,
पुरानी खिड़की से दुनिया अभी भी
भरी दिखती है अज्ञात रास्तों से

जो नया है उसे पुराना होना है
जो आज पुराना है वह कल भी पुराना है



16.4.1995



( जैसे जनम कोई दरवाज़ा)
कविता संग्रह --- 1997

Sunday, 12 May 2019

कविता फिर

 
कविता - मोहन राणा Poem - Mohan Rana
कविता - मोहन राणा Poem - Mohan Rana

अगर 

 

अगर जंगल ना होते तो कैसी होती पहचान पेड़ की
अगर दुःख ना होता तो ख़ुशी को कैसे जानता

बनता कुछ और नहीं
क्षण भर में ही अजन्मा नहीं
बस एक क़मीज़ पतलून
सुबह शाम भोजन
एक नन्ही सी उम्मीद
कोई याद कभी करे किसी एकांत में

अगर चुनता मैं कुछ और
कह पाता कभी जो रह जाता है
बहरे प्रदेशों में अनसुना हमेशा


(2009)

(शेष अनेक)
कविता संग्रह
©मोहन राणा
2019
[Shesh Anek /Poetry  collection]
Mohan Rana

Monday, 6 May 2019

स्कूल

स्कूल


पहले मुझे क़िताब की जिल्द मिली
फिर एक कॉपी
बस्ते में और कुछ नहीं बचा इतने बरस बाद
घंटी सुनते ही जाग पड़ा
मैदान में कोई नहीं था दसवीं बी में भी कोई नहीं
क्या आज स्कूल की छुट्टी है सोचा मैंने

हवाई जहाज मध्य यूरोप में कहीं था और मैं
कई बरस पहले अपने स्कूल

धरती ने ली सांस
हँसा समुंदर
आकाश खोज में है अनंतता की

बहुत पहले मैंने उकेरा अपना नाम मेज पर
समय की त्वचा के नीचे धूमिल
कोई तारीख़

कोई दोपहर उड़ा लाती हवा के साथ
किसी बात की जड़
मैं वह दीवार हूँ
जिसकी दरार में उगा है वह पीपल
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रचनाकाल: 5.9.2006

कविता संग्रह



© मोहन राणा  2019
 


The Cartographer

The Cartographer Between the lines it’s you, absent, but a silent presence just as the rain is absent in the passing clouds. There you ...