सबसे ऊँची छत से क्या बादल दिखाई देते हैं
क्या वहाँ भी होती है बारिश
क्या वहाँ भी बहते हैं पतझर के आँसू गिरती हुई बूँदों में
क्या वहाँ भी होती है दोपहर सुबह और शाम के बीच....
क्या वहाँ दुनिया को बनाने वाला कुम्हार रहता है
मिट्टी की बनी यह दुनिया टूट गई है सबसे ऊँची छत से गिर कर
क्या ठीक कर सकता है वह इसे.
©मोहन राणा
Saturday, November 07, 2009
Friday, November 06, 2009
जहाँ बादल सुनाते हैं संदेश
Thursday, October 15, 2009
याद करते तुम्हें
कितने दिन बाद मिले
यही याद है
बीते कितने दिन इस बीच
बेलें फैली सूखी दीवारों पर
बारिश में बह गईँ
छोड़ कर निशान
तस्वीरें भी पुरानी हो गईं
एकतरफा पहचानते पहचानते
पर सपनों में तुम हमेशा मिली
बीते वहाँ कई दिन
रोशनी और अँधेरा
खुशी की सलवटें
तुम्हारी आवाज वही है
पुकारो तो जरा मेरा नाम
मैं मुड़ कर पहचानना चाहता हूँ
एक अजनबी को बाजार में,
झिझकर माफी माँगता हूँ फिर से
बीते कितने दिन अटैची की तहों में
अतीत को देखूँ तो लगता
अभी तो पहला ही दिन शुरू हुआ
बीतते भविष्य के विस्तार में
हाथों में उछालते कैच करते
गेंद को फेंक देता हूँ उसके भीतर,
याद करते तुम्हें
मैं एक खोई गेंद को खोज रहा हूँ इस ऊँची घास के मैदान में.
Thursday, October 08, 2009
काबुलीवाला कहता है
मौसम तो जैसा है ठीक ही है
गरमी हो या सर्दी पतझर हो या बरसात
अगर में जग जाऊँ तो अच्छा है
पता नहीं पर दिल्ली में सब सो रहे हैं
यह कैसा अनाम मौसम,
पता नहीं वे किसके पैर हैं
गरमी हो या सर्दी पतझर हो या बरसात
अगर में जग जाऊँ तो अच्छा है
पता नहीं पर दिल्ली में सब सो रहे हैं
यह कैसा अनाम मौसम,
पता नहीं वे किसके पैर हैं
जिन्हें दिखता नहीं
कहते हैं अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं
कहते हैं अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं
दिल्ली में सब सो रहे हैं
किसकी यह नींद किसका यह सपना
सोचता काबुलीवाला
जागकर किसी को बताऊँ जो हैरान ना हो,
उनींदे में पुकारता जागते जागते रहो
किसकी यह नींद किसका यह सपना
सोचता काबुलीवाला
जागकर किसी को बताऊँ जो हैरान ना हो,
उनींदे में पुकारता जागते जागते रहो
Sunday, October 04, 2009
क्या सूरज हमारी स्मृतियों का लाइब्रेरियन है?
Thursday, September 10, 2009
मरीचिका
गहराती शाम की तंद्रा टूटती
किलकारी लेती अबाबील लगाती गोता छत की मुंडेर में,
छापा जाता है पैसे को मशीनों से
कागज पर लिखा मूल्य तय करता है
सड़क पर अस्मिता
तय करता है आवश्यकता,
महत्व केवल मूल्य के विचार भर से ही
और सच्चाई जैसे कोई स्मृति!
रेत और पानी में छुपी है समुंदर की सीत्कार
खुली आँखों से देखता यह सपना
प्यास परछाईँ की तरह साथ बैठी है
दीवार पर चस्पा जंगल उधड़ जाएगा
छूट जाएगी गोंद नकली वालपेपर की,
कभी हुआ करती थी उस दीवार में
खिड़की की तस्वीर
24.6.09 ©
किलकारी लेती अबाबील लगाती गोता छत की मुंडेर में,
छापा जाता है पैसे को मशीनों से
कागज पर लिखा मूल्य तय करता है
सड़क पर अस्मिता
तय करता है आवश्यकता,
महत्व केवल मूल्य के विचार भर से ही
और सच्चाई जैसे कोई स्मृति!
रेत और पानी में छुपी है समुंदर की सीत्कार
खुली आँखों से देखता यह सपना
प्यास परछाईँ की तरह साथ बैठी है
दीवार पर चस्पा जंगल उधड़ जाएगा
छूट जाएगी गोंद नकली वालपेपर की,
कभी हुआ करती थी उस दीवार में
खिड़की की तस्वीर
24.6.09 ©
Sunday, August 30, 2009
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