Monday, 24 June 2019

The Evening News and the Roof of the World : Mohan Rana


    सपने में मैंने देखा हम दुनिया की सबसे ऊँची छत पर थे
    फिर भी तारे बहुत दूर थे
   और अंतहीन था अँधेरा

    Then in a dream I saw that, though we were
on the highest roof in the world,
the stars were still far away
and the darkness had no end.
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DUAL POETRY PODCAST

The Evening News and the Roof of the World by Mohan Rana

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
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Tuesday, 11 June 2019

Poetry reading : Mohan Rana


After the poetry reading in London. The Far-Flung Shuffle!
At poetry cafe 25/5/19
https://poetrysociety.org.uk/event/the-shuffle-15-2019-05-25/

Gale Burns and Selina Rodrigues present a reading from far and wide:
Usha Akella, (Texas, USA), Paddy Bush (Ireland), Mohan Rana (Bath, UK), Theo Dorgan (Ireland), Adam Crittenden (USA), Ella Frears (London, UK)

 Paddy Bush, Adam Crittenden, Ella Frears, Mohan Rana























Monday, 3 June 2019

नुक़्ते में नुक़्ते में जुड़ते अक्षर


"घर बैठे छापें दुनिया में बेचें"

रेट लेंगे उतना ही पर तृप्ति किसे
और और कहते कहते फिर भी
नुक़्ते में नुक़्ते में जुड़ते अक्षर  पर वह शब्द
नहीं है मेरे शब्द कोश में

विश्वास -- पर पूरा कोश भरा है अविश्वास से !

शरमा जाते हैं,   वे अगर जी परन्तु
लक्ष्मी चाहे जिस झंडे की हो ;
वाम हो बजरंग हो रंग तो एक ही लाल
काँटा तो घरम काँटा  तोल कर 
पर हो बट्टा सौदे में,
रद्दी से ही बीन कभी कविता भी पाई जाती है
किसी विरले पल साँप सीढ़ी के खेल में किस्मत की जे बात,
किताब में लिखी है

बाज़ार भाव में कारीगर की कीमत
दो कौड़ी सेट है रचना मोक्षपथ में

अब तो आप भी मानते होंगे ना
करोना का कोई धरम नहीं होता,
रॉयल्टी किस बात की - कविता भी कोई काम है भला

अबकी बार हम फिर भूल जाएँगे
लौटते हुए घर का पता
 
© 2020

Tuesday, 28 May 2019

Poetry reading in May

The Far-Flung Shuffle
 
Gale Burns and Selina Rodrigues present a reading from far and wide:

Usha Akella, (Texas, USA), Paddy Bush (Ireland), Mohan Rana (Bath, UK), Theo Dorgan (Ireland), Adam Crittenden (USA), Ella Frears (London, UK)


Friday, 24 May 2019

जो पास सामने



कविता poem_mohan rana
















अपना एक देस

लोगों ने वहाँ बस याद किया भूलना ही
था ना अपना एक देस बुलाया नहीं फिर,
कोई ऐसा वादा भी नहीं कि इंतज़ार हो,
पहर ऐसा हवा भटकती
सांय सांय सिर फोड़ती खिड़की दरवाज़ों पर,
दराज़ों को खंगालता हूँ सबकुछ उनमें पर कुछ भी नहीं जैसे
चीज़ें इस कमरे में चीज़ें मैं भी एक चीज़ जैसे
मुझे ख़ुद भी नहीं मालूम मेरी उम्मीद क्या निरंतर खोज के सिवा,
अपनी नब्ज़ पकड़े मैं देस खोजता हूँ नक़्शों में
धूप की छाया से दिशा पता करते
पर मिलीं मुझे शंकाएँ हीं अब तक

मोहन राणा © 2019 

(स्रोत कविता संग्रह  /  रेत का पुल,2012)

Wednesday, 15 May 2019

कविता


पुरानी खिड़की


दूरबीन में नज़रबंद हैं दूरियाँ
वो जो अटारी में कहीं  रखी है

पुरानी खिड़की पर ज़रा भी कहीं निशान नहीं
हवा धूप और बारिश का
समय पर किया रंग चमकता है,
फिर भी उसे पुराना कहा जाता है पुरानी खिड़की
किताबों में बंद पड़े हैं शब्द अनगिनत
गत्ते के डिब्बों में  बंद पड़ी हैं किताबें,
पुरानी खिड़की  के सिर्फ़ शीशे हुए हैं पुराने
जैसे पुराना ज़माना
पुरानी कमीज़
पुरानी कविता
पुरानी कोई बात,
उसके जीवन  के अस्सी साल दो पन्नों में सिमटे हैं
दो पन्ने कंप्यूटर की स्मृति में जमा हैं

पुरानी खिड़की से स्थिर नहीं दिखती दुनिया
डगमगाती दुनिया  में धीरे से हिलती हैं नाशपाती के पेड़ की टहनियाँ,
उतरते हैं बादल भरती है उड़ान चिड़िया
ढलानों  पर उतरती  हैं भेड़ें दोपहर की तरह,
पुरानी खिड़की से दुनिया अभी भी
भरी दिखती है अज्ञात रास्तों से

जो नया है उसे पुराना होना है
जो आज पुराना है वह कल भी पुराना है



16.4.1995



( जैसे जनम कोई दरवाज़ा)
कविता संग्रह --- 1997

Sunday, 12 May 2019

कविता फिर

 
कविता - मोहन राणा Poem - Mohan Rana
कविता - मोहन राणा Poem - Mohan Rana

अगर 

 

अगर जंगल ना होते तो कैसी होती पहचान पेड़ की
अगर दुःख ना होता तो ख़ुशी को कैसे जानता

बनता कुछ और नहीं
क्षण भर में ही अजन्मा नहीं
बस एक क़मीज़ पतलून
सुबह शाम भोजन
एक नन्ही सी उम्मीद
कोई याद कभी करे किसी एकांत में

अगर चुनता मैं कुछ और
कह पाता कभी जो रह जाता है
बहरे प्रदेशों में अनसुना हमेशा


(2009)

(शेष अनेक)
कविता संग्रह
©मोहन राणा
2019
[Shesh Anek /Poetry  collection]
Mohan Rana

Monday, 6 May 2019

स्कूल

स्कूल


पहले मुझे क़िताब की जिल्द मिली
फिर एक कॉपी
बस्ते में और कुछ नहीं बचा इतने बरस बाद
घंटी सुनते ही जाग पड़ा
मैदान में कोई नहीं था दसवीं बी में भी कोई नहीं
क्या आज स्कूल की छुट्टी है सोचा मैंने

हवाई जहाज मध्य यूरोप में कहीं था और मैं
कई बरस पहले अपने स्कूल

धरती ने ली सांस
हँसा समुंदर
आकाश खोज में है अनंतता की

बहुत पहले मैंने उकेरा अपना नाम मेज पर
समय की त्वचा के नीचे धूमिल
कोई तारीख़

कोई दोपहर उड़ा लाती हवा के साथ
किसी बात की जड़
मैं वह दीवार हूँ
जिसकी दरार में उगा है वह पीपल
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रचनाकाल: 5.9.2006

कविता संग्रह



© मोहन राणा  2019
 


Monday, 1 April 2019

New Poems

"आधारशिला" पत्रिका के मार्च (2019) अंक में कुछ कविताएँ।




Wednesday, 30 January 2019

मोहन राणा की तीन कवितायें



मोहन राणा की तीन कवितायें


Mohan Rana
मोहन राणा


























मोहन राणा ने उपरोक्त तीन कवितायें विशेष तौर पर raagdelhi.com के लिए भेजी हैं।  
 

Wednesday, 16 January 2019

साहित्य विशेषांक



 नाम नहीं मिल रहे थे कुछ दिन बीते, किसी ने बताया यहाँ देखो.
तो आप भी देखें यह त्योहारी समकाल पद्य अंक.
(ना) पसंद आए तो भी आप भी जरूर लिखें
"अच्छी कविताएँ हैं"

अपने एकांत में बेचारा छायावादी किंकर्तव्य-विमूढ़ हो गया
गड्डी की हैडलाइट के सामने खरगोश की तरह,

खिताबी कवि ब्रेक नहीं दबाते


2019 © मोहन राणा

Language of poetry : Mohan Rana, pjesnik na Svački

  Rather than mapping human-made political borders or country lines, Rana acts as a cartographer of "nameless, invisible boundaries...